ये मासूम सा दिल मेरा !

 
     ज़माने की ठोकरों से मुझे, महसूस होने लगा है !
     ये मासूम सा दिल मेरा, पत्थर सा होने लगा है !!
 
     पहले छोटी-छोटी सी बातें, किया करतीं थीं परेशान !
     अब परेशानियों का पहाड़ भी, राई सा होने लगा है !!
 
     पहले मेरा दिल हुआ करता था, छोटा सा तालाब !
     अब आहिस्ता-आहिस्ता ये, समंदर सा होने लगा है !!
 
     मैं रोता रहता था अपनों से, बिछड़ने के गम में !
     अब मिलना और बिछड़ना , मौसम सा होने लगा है !!
 
     मैं उठता नहीं था, फिर से गिरने के डर से !
     अब उठ कर जीतना, मुकद्दर सा होने लगा है !!
 
                                      प्रमोद मौर्या "प्रेम"
 

परमजीत सिहँ बाली  – (7 अगस्त 2012 को 9:52 am)  

बहुत बढ़िया ग़ज़ल!बधाई स्वीकारें

टिप्पणी पोस्ट करें

About This Blog

  © Blogger template Shush by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP